तमिलनाडु ने खोया एक महान राजनेता और कलाकार

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द्रविड़ सम्मान का झंडा बुलंद करने वाले एम करूणानिधि का 94 साल की उम्र में देहांत हो गया. 28 जुलाई को उन्हें कावेरी हॉस्पिटल भर्ती किया गया था. 7 अगस्त शाम 6:10 को उन्होंने अंतिम साँस ली. 2016 से ही उनकी तबियत दिन-प्रतिदिन ख़राब थी.

मरकर भी कुछ लोग सदियों तक याद किए जाते हैं और ऐसे में भलां गरीब घर में जन्मे करूणानिधि तमिलनाडु राजनीती के स्क्रिप्टराइटर को कौन भूल सकता हैं. तमिलनाडु की राजनीती के भीष्म पितामह कहे जाने वाले करूणानिधि डीमके के अध्यश के तौर पर 50 सालों तक राजनीती में रहे. वो राजनीती में मौजूद ही नहीं रहे बल्कि जब भी चुनाव के रन में उतरे तो उनका विजय रथ हमेशा विजयी होता रहा. 13 बार विधानसभा चुनाव लड़ा और हर बार विजयी हुए. 5 बार तमिलनाडु के बतौर मुख्यमंत्री रहे. किशोरावस्था में ही सार्वजनिक जीवन की तरफ कदम बढ़ा दिया था. मद्रास प्रेसीडेंसी ने जब विद्यालय के सिलेबस में हिंदी का समावेश किया तब विरोध-प्रदर्शन में हिस्सा लिया था. 17 साल की उम्र तक राजनीती में माफ़ी सक्रीय हो चुके थे. तमिल स्टूडेंट फोरम के नाम से उन्होंने छात्रों का संघटन बना लिया था.

सिनेमा जगत में उन्होंने जब कदम रखा वहां भी उन्हें सफलता मिली. सिनेमा के लिए वो स्क्रिप्ट लिखते और उनकी लिखी स्क्रिप्ट तमिल सिनेमा में डायलॉग्स बन जाते. जब 1952 में आई फिल्म ‘पराशक्ति’ साउथ के सिनेमा में दो चीजें लेकर आई. पहला, फिल्म के जरिए सिनेमा में राजनितिक विचारधारा का प्रचार प्रसार हुआ. दूसरा, इस फिल्म से तमिल में एंटरटेनमेंट की दुनिया में डायलॉग्स का दौर शुरू हुआ. इस फिल्म की स्टोरी और स्क्रीनप्ले दोनों ही करूणानिधि ने लिखे थे. हालाँकि ये फिल्म अपने समय की सबसे विवादित फिल्म थी. फिल्म में अन्न्दुरई और पेरियार की विचारधारा को खुल कर दिखाया गया था. पराशक्ति में हिन्दू रीतिरिवाज, मंदिर पूजा जैसी चीजों के खिलाफ थी. समाज की बुराइयों के खिलाफ हथियारों का समर्थन किया गया था. सबसे खास बात ये थी की करूणानिधि के डायलॉग में सामाजिक न्याय और तरक्कीपसंद समाज की बातें थी. फिल्म के शानदार डायलॉस के द्वारा उस वक्त की सामाजिक व्यवस्था पर सवाल उठाए गए थे. स्क्रीप्टरायटर के तौर पर करूणानिधि ने खुप नाम कमाया. साथ ही पत्रकारिता भी करते रहे. और उनका रुझान राजनीती की तरफ बढ़ता चला गया.

राजनितिक सफर की शुरुवात  –

करुणानिधि ने 1957 से चुनाव लड़ना शुरू किया था. पहले प्रयास में वो कुलिथलाई से विधायक बने. जब 1967 में उनकी पार्टी डीएमके ने राज्य की सत्ता हासिल की, तो सरकार में वो मुख्यमंत्री अन्नादुरै और नेदुनचेझियां के बाद तीसरे सबसे सीनियर मंत्री बने थे. डीएमके की पहली सरकार में करुणानिधि को लोक निर्माण और परिवहन मंत्रालय मिले थे. परिवहन मंत्री के तौर पर उन्होंने राज्य की निजी बसों का राष्ट्रीयकरण किया और राज्य के हर गांव को बस के नेटवर्क से जोड़ना शुरू किया. इसे करुणानिधि की बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है. जब करुणानिधि के उस्ताद सीएन अन्नादुरै की 1969 में मौत हो गई, तो वो मुख्यमंत्री बने. करुणानिधि के मुख्यमंत्री बनने से राज्य की राजनीति में नए युग की शुरुआत हुई थी.

1)     करुणानिधि की पहली सरकार के कार्यकाल में ज़मीन की हदबंदी को 15 एकड़ तक सीमित कर दिया गया था. यानी कोई भी इससे ज़्यादा ज़मीन का मालिक नहीं रह सकता था.

2)    शिक्षा और नौकरी में पिछड़ी जातियों को मिलने वाले आरक्षण की सीमा 25 से 31 फीसदी कर दी गयी.

3)    कानून बनाकर सभी जातियों के लोगों को मंदिर के पुजारी बनने का रास्ता साफ किया.

4)    कानून बनाकर लड़कियों को भी पिता की संपत्ति में बराबर का हक़ दिलाया.

5)    सरकारी नौकरियों में महिलायों को 30 प्रतिशत आरक्षण.

6)    चेन्नई में मेट्रो ट्रेन सेवा की शुरवात की.

7)    सरकारी राशन दुकान में 1रुपया किलो चावल देना.

8)    जनता के लिए मुफ़्त स्वास्थ्य बीमा.

9)    दलितों को मुफ़्त में घर.

10)   ‘सामथुवापुरम’ के नाम से हाउसिंग स्कीम के तहत दलितों और ऊँची जाती के हिन्दुओं को मुफ़्त में घर दिए , की वो जाती के बन्धनों से आज़ाद होकर साथ-साथ मिलके रहे. योजना के तहत बने घर दलितों और सवर्ण के घर अगल-बगल थे.

उनके कई काम सियासत में मील के पत्थर साबित हुए. येही कारण था जो अपार जनसमूह उनके भाषणों के समय उमड़ पड़ता था. आज की तारीख़ में ऐसे बहुत ही कम नेता बचे हैं जिन्होंने अपना सियासी करियर आज़ादी के पहले शुरू किया था. करुणानिधि उन गिने-चुने नेताओं में से एक थे. उनके जाने से निश्चित रूप से एक युग का अंत हुआ है.

 

 

 

 


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